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the last bench

Harsh_Pathak_3914
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Chapter 1 - the last bench

सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल की घंटी जैसे ही बजती, पूरा स्कूल शोर से भर जाता। उसी शोर में कक्षा 10-B की आख़िरी बेंच पर बैठा आरव हमेशा खिड़की से बाहर देखता रहता। उसे पढ़ाई से ज़्यादा बारिश, आसमान और… अनाया पसंद थी।

अनाया नई-नई स्कूल में आई थी। सफ़ेद यूनिफॉर्म, दो चोटी और आँखों में अजीब-सी चमक। वो ज़्यादा बोलती नहीं थी, लेकिन जब बोलती तो पूरी क्लास चुप हो जाती। आरव उसे रोज़ देखता, मगर कभी बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

एक दिन गणित के पीरियड में टीचर ने ग्रुप प्रोजेक्ट दिया। किस्मत से आरव और अनाया एक ही ग्रुप में आ गए। आरव के हाथ काँप रहे थे, जब उसने पहली बार उससे पूछा,

"तुम सवाल नंबर 3 कर लोगी?"

अनाया ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

"हाँ… लेकिन मुझे समझ नहीं आया तो पूछ लूँगी।"

वही मुस्कान आरव के लिए पूरे दिन की सबसे बड़ी खुशी बन गई।

धीरे-धीरे बातें होने लगीं। कभी होमवर्क पर, कभी स्कूल के पीपल के पेड़ के नीचे, कभी लाइब्रेरी में। दोनों को एहसास भी नहीं हुआ कि कब दोस्ती कुछ और बन गई। लेकिन दोनों ही अपने दिल की बात कहने से डरते थे।

फिर आया फेयरवेल डे। पूरा स्कूल रंग-बिरंगे कपड़ों में सजा था। आरव ने तय कर लिया था कि आज वो अपने दिल की बात कहेगा। लेकिन जैसे ही उसने अनाया को देखा, शब्द गले में अटक गए।

शाम को स्कूल की छत पर खड़े होकर अनाया ने कहा,

"कल से सब बदल जाएगा ना?"

आरव ने धीरे से जवाब दिया,

"हाँ… लेकिन कुछ यादें हमेशा साथ रहती हैं।"

अनाया ने उसकी तरफ देखा और कहा,

"तुम मेरी सबसे प्यारी याद हो, आरव।"

बस… इतना ही काफ़ी था। कोई प्रपोज़ नहीं, कोई वादा नहीं—सिर्फ़ एक सच्चा एहसास।

आज कई साल बाद, आरव जब भी बारिश देखता है, उसे आख़िरी बेंच, पीपल का पेड़ और अनाया की वो मुस्कान याद आ जाती है।

कभी-कभी प्यार मिलना ज़रूरी नहीं होता,

कभी-कभी उसे याद बन जाना ही काफ़ी होता है।