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Chapter 1 - saya

साया: काली घाटी का अभिशाप

अध्याय 1: अनिष्ट की आहट

आर्यन का कैमरा उसकी गर्दन के चारों ओर एक भारी बोझ की तरह लटका हुआ था। पेशे से एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और दिल से पुराने खंडहरों का खोजी, आर्यन हमेशा ऐसी जगहों की तलाश में रहता था जहाँ आम इंसान जाने से कतराते हों। 'काली घाटी' के बारे में उसने एक पुराने अखबार के कोने में पढ़ा था। एक ऐसा गाँव जो नक्शे से गायब हो चुका था, लेकिन जिसकी कहानियाँ आज भी आसपास के शहरों में फुसफुसाहटों के रूप में जिंदा थीं।

जैसे-जैसे उसकी जीप ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर आगे बढ़ रही थी, चीड़ के घने जंगल और गहरे होते जा रहे थे। दोपहर के तीन बज रहे थे, लेकिन सूरज की रोशनी ज़मीन तक नहीं पहुँच पा रही थी। हवा में एक अजीब सी भारीपन था। अचानक, जीप का इंजन गड़गड़ाहट के साथ बंद हो गया। सन्नाटा इतना गहरा था कि आर्यन को अपनी खुद की सांसें साफ़ सुनाई दे रही थीं।

उसने नीचे उतरकर देखा, तो पाया कि सड़क पर बड़े-बड़े पत्थर रखे थे, जैसे किसी ने जानबूझकर रास्ता रोका हो। दूर एक ऊँचे टीले पर वह विशाल हवेली खड़ी थी— 'सफेद मौत'।

अध्याय 2: गाँव का खौफनाक स्वागत

गाँव के नाम पर वहाँ सिर्फ 10-12 टूटी-फूटी झोपड़ियाँ थीं। लोग डरे-सहमे हुए थे। आर्यन ने एक बुजुर्ग, रहमत चाचा, से हवेली के बारे में पूछा।

रहमत चाचा ने अपनी काँपती हुई उंगलियों से हवेली की ओर इशारा किया, "बेटा, यहाँ से वापस चले जाओ। वह दीवारें सिर्फ ईंटों की नहीं, इंसानी चीखों से बनी हैं। ठाकुर गजेंद्र सिंह ने 100 साल पहले जो पाप किया था, उसका साया आज भी इस मिट्टी में मिला हुआ है।"

आर्यन ने मुस्कुराकर टाल दिया, "चाचा, मैं बस कुछ तस्वीरें लूँगा और निकल जाऊँगा। मैं भूतों में यकीन नहीं रखता।"

रहमत चाचा की आँखें फटी की फटी रह गईं, "भूत? नहीं बेटा, वहाँ मौत से भी बदतर कुछ रहता है। मृणालिनी की रूह वहाँ कैद है, और वह आज भी किसी ऐसे शख्स का इंतज़ार कर रही है जो उसे इस कैद से आज़ाद कर सके... या फिर उसकी जगह ले सके।"

अध्याय 3: हवेली का प्रवेश द्वार

शाम के साये गहरे हो रहे थे जब आर्यन हवेली के मुख्य द्वार पर पहुँचा। लोहे का भारी दरवाजा जंग खाया हुआ था और उस पर अजीब से तांत्रिक चिन्ह खुदे थे। जैसे ही उसने दरवाजे को धक्का दिया, वह एक लंबी कराह के साथ खुल गया।

अंदर का नज़ारा किसी डरावने सपने जैसा था। फर्श पर धूल की मोटी परत थी, लेकिन उस धूल पर छोटे बच्चों के पैरों के ताज़ा निशान बने हुए थे। "कोई है?" आर्यन की आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस आई, लेकिन वह उसकी अपनी आवाज़ नहीं थी। वह कुछ भारी और कटी-फटी सी आवाज़ थी।

हवेली के हॉल में एक आदमकद शीशा था। आर्यन ने जैसे ही उसके पास से गुज़रने की कोशिश की, उसे महसूस हुआ कि शीशे के अंदर का आर्यन उसके साथ नहीं चल रहा है। वह शीशे वाला आर्यन वहीं खड़ा उसे घूर रहा था और उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी।

अध्याय 4: तहखाने का रहस्य

तस्वीरें खींचते-खींचते आर्यन हवेली के सबसे निचले हिस्से, तहखाने तक पहुँच गया। वहाँ की हवा में सड़ी हुई लाशों जैसी दुर्गंध थी। दीवारें चिपचिपी थीं और वहाँ से लाल रंग का गाढ़ा तरल रिस रहा था।

वहाँ उसे एक भारी पत्थर की दीवार मिली, जिस पर 'मृणालिनी' लिखा था। रहमत चाचा की बात सच थी। यह वही जगह थी जहाँ उस मासूम लड़की को जिंदा चुनवाया गया था। जैसे ही आर्यन ने उस दीवार पर हाथ रखा, उसे एक तेज़ बिजली का झटका लगा। उसके दिमाग में हज़ारों चीखें एक साथ गूँज उठीं। उसे ठाकुर गजेंद्र सिंह की क्रूर हँसी सुनाई दी, जो कह रहा था, "अमरता का मूल्य खून है!"

अचानक, वह पत्थर की दीवार दरकने लगी। अंदर से एक सफेद धुआँ निकला और आर्यन के चारों ओर लिपट गया। उसे अपनी आँखों के सामने मृणालिनी की मौत का पूरा मंज़र दिखने लगा—कैसे ठाकुर ने अपनी तांत्रिक शक्ति के लिए उसकी बलि दी थी।

अध्याय 5: साये का खेल

रात के 2 बजे थे। हवेली अब पूरी तरह जाग चुकी थी। ऊपर की मंजिल पर भारी जंजीरों के खिंचने की आवाज़ आ रही थी। आर्यन भागकर मुख्य द्वार की ओर गया, लेकिन दरवाजा गायब हो चुका था। वहाँ अब सिर्फ एक दीवार थी।

वह फँस चुका था। उसने अपनी टॉर्च जलाई, लेकिन रोशनी भी जैसे अंधेरे में विलीन हो रही थी। तभी उसे गलियारे के अंत में एक औरत दिखी। उसके सफेद कपड़े खून से सने थे और उसके बाल ज़मीन पर साँप की तरह रेंग रहे थे। वह मृणालिनी थी। लेकिन वह डरी हुई नहीं थी, वह गुस्से में थी।

"तुमने उसे जगा दिया..." वह फुसफुसाई।

"किसे?" आर्यन की आवाज़ काँप रही थी।

"उसे, जिसे मैं 100 साल से दबाए बैठी थी। ठाकुर गजेंद्र सिंह की रूह को!"

तभी फर्श के नीचे से काले हाथ निकले और आर्यन के पैरों को जकड़ लिया। हवेली की दीवारें हिलने लगीं। आर्यन ने देखा कि मृणालिनी की रूह उसे बचाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन ठाकुर की काली छाया उसे अपनी ओर खींच रही थी।

अध्याय 6: आखिरी संघर्ष

आर्यन ने अपनी जेब से वह कैमरा निकाला जिसमें उसने हवेली के तांत्रिक चिन्हों की फोटो ली थी। उसने फ्लैश जलाया। तेज़ रोशनी से वह काला साया एक पल के लिए पीछे हटा। आर्यन समझ गया कि ये साये रोशनी और सच से डरते हैं।

उसने तहखाने में रखे ठाकुर के पुराने अवशेषों और तांत्रिक किताबों को आग लगा दी। हवेली एक भयानक विस्फोट के साथ काँप उठी। मृणालिनी की रूह ने आर्यन को एक गुप्त रास्ते की ओर धक्का दिया। "भागो! इससे पहले कि यह सब राख हो जाए।"

आर्यन बाहर की ओर भागा। पीछे हवेली आग की लपटों में घिरी थी और उसमें से किसी राक्षस के चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं।

अध्याय 7: सस्पेंस और ट्विस्ट (The Final Reveal)

अगली सुबह आर्यन अपने शहर के अस्पताल में उठा। पुलिस ने उसे बताया कि काली घाटी में कोई हवेली नहीं है। वहाँ सालों पहले सब कुछ जलकर राख हो चुका था। आर्यन ने हंसकर कहा, "लेकिन मेरे पास सबूत है, मेरा कैमरा!"

उसने कांपते हाथों से कैमरे का मेमोरी कार्ड निकाला और लैपटॉप में डाला। पुलिस और डॉक्टर भी उसके पीछे खड़े थे।

पहली तस्वीर: हवेली का मुख्य द्वार—साफ और नया, जैसे आज ही बना हो।

दूसरी तस्वीर: ठाकुर गजेंद्र सिंह की एक पेंटिंग—लेकिन पेंटिंग में ठाकुर का चेहरा अब आर्यन जैसा दिख रहा था।

तीसरी तस्वीर: तहखाने की वह दीवार—वहाँ अब 'मृणालिनी' नहीं, बल्कि 'आर्यन' का नाम लिखा था।

डॉक्टर ने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा, "मिस्टर आर्यन, आप किस कैमरे की बात कर रहे हैं? आपके पास कोई कैमरा नहीं मिला। आप तो तीन दिनों से इस कमरे में बंद हैं और दीवारों पर अपने नाखून से कुछ लिख रहे हैं।"

आर्यन ने आईने की तरफ देखा। आईने में उसका अक्स नहीं था। वहाँ सिर्फ एक खाली दीवार थी जिस पर खून से लिखा था: "स्वागत है ठाकुर, नया शरीर मुबारक हो।"

आर्यन के चेहरे पर एक डरावनी मुस्कान आई। उसने डॉक्टर की गर्दन पकड़ी और उसकी आँखों में वही काला सन्नाटा छा गया जो उसने हवेली में देखा था। 'काली घाटी' कभी खत्म नहीं हुई थी, वह बस एक नए शिकार के इंतज़ार में थी।